संत भी, शासक भी : मठ की तपस्या और सत्ता की दृढ़ता का संग
योगी आदित्यनाथ के व्यक्तित्व का अनूठा आयाम

अनिल त्रिपाठी
लखनऊ। भारतीय राजनीति में ऐसे व्यक्तित्व विरले ही मिलते हैं जिनके एक हाथ में आध्यात्मिक परंपरा की मशाल हो और दूसरे हाथ में शासन की बागडोर। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ऐसे ही अद्वितीय व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने गोरक्षपीठ की सनातन साधना और लोकतांत्रिक सत्ता के दायित्वों के बीच एक अनोखा संतुलन स्थापित किया है। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक ऐसे संत हैं जिनकी पहचान मठ की तपस्या, राष्ट्रवाद के प्रति समर्पण और प्रशासनिक दृढ़ता से निर्मित हुई है। आज जब देश और प्रदेश उनके राजनीतिक तथा सामाजिक योगदान का मूल्यांकन कर रहा है, तब यह स्पष्ट दिखाई देता है कि योगी आदित्यनाथ का व्यक्तित्व परंपरा और परिवर्तन, धर्म और विकास, साधना और सत्ता का जीवंत संगम है। गोरखनाथ मठ की आध्यात्मिक विरासत से निकलकर देश के सबसे बड़े राज्य की सत्ता संभालने तक की उनकी यात्रा संघर्ष, संकल्प और कर्मयोग की प्रेरक गाथा है। यही कारण है कि समर्थकों की नजर में वे केवल मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक कर्मयोगी संत और युग निर्माण के अग्रदूत के रूप में स्थापित हो चुके हैं।
कहते हैं नदियां अचानक नहीं बनतीं। वे पहले किसी पर्वत की निस्तब्धता में जन्म लेती हैं, फिर चट्टानों से टकराती हैं, घाटियों से गुजरती हैं, मैदानों को सींचती हैं और अंततः करोड़ों लोगों के जीवन का आधार बन जाती हैं। कुछ व्यक्तित्व भी ऐसे ही होते हैं। उन्हें केवल उनके वर्तमान से नहीं समझा जा सकता। उन्हें समझने के लिए उनके स्रोत तक जाना पड़ता है। राम और राष्ट्र के आराधक, मर्यादा और मातृभूमि के साधक योगी आदित्यनाथ को समझने के लिए भी हिमालय की शरण में जाना होगा। क्योंकि यह दास्तान गढ़वाल की उन वादियों से शुरू होती है, जहां प्रकृति मनुष्य को मौन रहकर भी बहुत कुछ सिखाती है। जहां पर्वत स्थिर रहकर धैर्य का पाठ पढ़ाते हैं। जहां नदियां बहकर समर्पण का अर्थ समझाती हैं। जहां आकाश की विराटता मनुष्य को उसके छोटे होने का बोध कराती है।
अक्सर लोग मुख्यमंत्री, सांसद या गोरक्षपीठाधीश्वर के रूप में योगी आदित्यनाथ को देखते हैं, लेकिन इस व्यक्तित्व के पीछे एक ऐसा युवक भी था जिसने सांसारिक जीवन की सामान्य आकांक्षाओं को छोड़कर आध्यात्मिक मार्ग चुना। उत्तराखंड के एक साधारण परिवार से निकलकर गोरखनाथ परंपरा में स्वयं को समर्पित कर देना केवल करियर का परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का परिवर्तन था। यह त्याग उनके व्यक्तित्व की वह नींव बना, जिसने बाद में प्रशासनिक कठोरता और व्यक्तिगत सादगी को एक साथ जोड़ा।
सुपथ के पथिक बन गए
जब साधना व्यक्ति से बड़ी हो जाती है, तब जीवन का केंद्र भी बदल जाता है। मनुष्य तब अपने लिए नहीं, किसी बड़े उद्देश्य के लिए जीने लगता है। यहीं से धीरे-धीरे योगी आदित्यनाथ का सृजन होने लगा। उनका जीवन अब निजी सीमाओं में नहीं रहा। संन्यास ने उनके व्यक्तित्व को परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से लोकमंगल के व्यापक आयाम से जोड़ दिया। इसलिए वे घर से मठ, मठ से समाज और समाज से राष्ट्र के सुपंथ के पथिक बन गए।
“हम चाकर रघुवीर के…”
योगी आदित्यनाथ के सार्वजनिक जीवन को देखते हुए श्रीरामचरितमानस की पंक्ति ‘हम चाकर रघुबीर के…’ बार-बार स्मरण हो आती है, क्योंकि उनके लिए राम केवल आराध्य नहीं हैं। वे मर्यादा हैं। वे दायित्व हैं। वह अदृश्य कसौटी हैं, जिस पर वे स्वयं को बार-बार परखते दिखाई देते हैं। शायद इसी कारण उनके व्यक्तित्व में एक अद्भुत द्वंद्व साथ-साथ चलता है। एक ओर कठोर निर्णय लेने वाला प्रशासक। दूसरी ओर किसी पीड़ित की व्यथा सुनकर द्रवित हो जाने वाला मनुष्य। एक ओर अपराध के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस का संकल्प। दूसरी ओर जनता दर्शन में घंटों खड़े रहकर लोगों की बातें सुनने का धैर्य। एक ओर सत्ता। दूसरी ओर सेवा। एक ओर शासन। दूसरी ओर साधना। यही वह बिंदु है जहां योगी आदित्यनाथ एक राजनीतिक व्यक्तित्व भर नहीं रह जाते। एक प्रतीक बन जाते हैं। एक प्रवृत्ति बन जाते हैं। शायद इसी कारण उनके व्यक्तित्व में रामभक्ति और राष्ट्रभक्ति एक ही दीप की दो ज्योतियां प्रतीत होती हैं। इसीलिए वैदिक ऋषियों का उद्घोष ‘इदं राष्ट्राय, इदं न मम’ भी उनके जीवन-दर्शन के निकट प्रतीत होता है।
सत्ता में रहकर भी मठ की दिनचर्या
राजनीतिक जीवन में वैभव और सुविधाएं सामान्य बात मानी जाती हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ का एक पक्ष यह भी है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने अपनी मूल साधु जीवनशैली को काफी हद तक बनाए रखा। सुबह की नियमित पूजा, अनुशासित दिनचर्या और सीमित व्यक्तिगत आवश्यकताएं उनके जीवन का हिस्सा बनी रहीं। राजनीति में यह संयम दुर्लभ माना जाता है, क्योंकि सत्ता अक्सर व्यक्ति की जीवनशैली को बदल देती है।
अपनी नीतियों से बनाया विश्वास
उत्तर प्रदेश का नाम सुनते ही लोगों की स्मृति में अपराध आता था। अपराध से भय आता था। भय से अविश्वास जन्म लेता था और अविश्वास से विकास की हर संभावना सिकुड़ जाती थी। लेकिन इतिहास का नियम है कि किसी भी समाज का पुनर्जागरण पहले उसके आत्मविश्वास में होता है। सड़कें बाद में बनती हैं। इमारतें बाद में बनती हैं। आर्थिक आंकड़े बाद में बदलते हैं। सबसे पहले मनुष्य का विश्वास बदलता है। पिछले साढ़े नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने इसी विश्वास की वापसी देखी है। योगी के नेतृत्व में व्यवस्था को स्थापित करने का प्रयास हुआ। व्यवस्था से विश्वास लौटा। विश्वास से निवेश आया। निवेश से अवसर पैदा हुए और अवसरों ने युवाओं की आंखों में फिर से सपने बो दिए। आज एक्सप्रेस-वे केवल सड़कें नहीं हैं, वे गति के नए गीत हैं। एयरपोर्ट केवल इमारतें नहीं हैं, वे संभावनाओं के आकाशद्वार हैं। मेडिकल कॉलेज केवल संस्थान नहीं हैं, वे जनविश्वास की जीवनरेखाएं हैं। उन लाखों परिवारों की राहत लगते हैं, जिनकी उम्मीदें कभी संसाधनों की कमी में दम तोड़ देती थीं।
कठोर छवि के पीछे संवेदनशीलता
योगी आदित्यनाथ की सार्वजनिक छवि एक सख्त प्रशासक की रही है। लेकिन उनके निकट रहने वाले अनेक लोग बताते हैं कि वे व्यक्तिगत स्तर पर लोगों की समस्याएं सुनने में विशेष रुचि रखते हैं। गोरखपुर में जनता दरबार की परंपरा इसका उदाहरण मानी जाती है, जहां वर्षों तक आम लोग सीधे अपनी समस्याएं लेकर पहुंचते रहे। किसी गरीब की बीमारी, छात्र की फीस या किसी परिवार की प्रशासनिक समस्या—इन विषयों पर उनका व्यक्तिगत हस्तक्षेप कई लोगों के लिए आशा का किरण बनी हैं।
आलोचना और प्रशंसा के बीच संतुलन
किसी भी बड़े नेता की तरह योगी आदित्यनाथ के समर्थक भी हैं और आलोचक भी। लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है कि उन्होंने अपने व्यक्तित्व को परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदला। जो विचार और जीवनशैली एक युवा संन्यासी के रूप में थी, वही मूल स्वर आज भी दिखाई देता है। यही निरंतरता उन्हें समकालीन राजनीति के अनेक नेताओं से अलग बनाती है।
इस लिए जनमानस में लोकप्रिय
योगी आदित्यनाथ ने केवल प्रदेश का भूगोल नहीं बदला। उन्होंने उसके मानस को भी बदलने का प्रयास किया और जब किसी प्रदेश का मानस बदलता है, तब उसका भविष्य भी बदलने लगता है। यही कारण है कि आज योगी आदित्यनाथ केवल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं हैं। वे करोड़ों युवाओं की आकांक्षाओं में उपस्थित हैं। वे उन किसानों की आशाओं में उपस्थित हैं जो अपने श्रम का सम्मान चाहते हैं। वे उन माताओं की प्रार्थनाओं में उपस्थित हैं जो अपने बच्चों के लिए सुरक्षित और समृद्ध भविष्य चाहती हैं।
करोड़ों लोगों की आशाओं के केंद्र बिंदु
अंततः कुछ लोग पदों से बड़े हो जाते हैं। कुछ लोग समय से बड़े हो जाते हैं। कुछ लोग इतिहास में दर्ज होते हैं, कुछ स्मृतियों में। किंतु विरले ही ऐसे होते हैं जो अपने समय की आशाओं में बस जाते हैं। योगी आदित्यनाथ उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक हैं।



