70-80 के दशक में रेडियो कमेंट्री के जरिए क्रिकेट को घर-घर पहुंचाने वाले दिग्गज कमेंटेटर्स रवि चतुर्वेदी और सुशील दोषी की आवाज़ों का जादू
जब क्रिकेट का रोमांच 'ट्रांजिस्टर' में बंद होता था
Asheesh srivastava
आज हमारे पास 4K स्क्रीन, ड्रोन कैमरा और बॉल-ट्रैकिंग टेक्नोलॉजी है। एक क्लिक पर हजारों रिप्ले मिल जाते हैं। लेकिन 70 और 80 के दशक में क्रिकेट का असली मज़ा ऑल इंडिया रेडियो के ट्रांजिस्टर पर था। स्कूल की क्लास हो या दफ्तर की मीटिंग, जेब में रखा छोटा सा ट्रांजिस्टर और कान में लगा इयरफोन ही मैच का स्कोरकार्ड होता था। उस दौर की तीन आवाज़ों ने पूरे देश को क्रिकेट सिखाया।
डॉ. नरोत्तम पुरी: आंकड़ों के जादूगर
पेशे से ईएनटी डॉक्टर, लेकिन जुनून से क्रिकेट के विश्वकोश। डॉ. नरोत्तम पुरी की अंग्रेजी कमेंट्री में ठहराव और गहराई थी। “The ball races away to the boundary…” उनका बोलने का सभ्य अंदाज़ श्रोताओं को बांध लेता था। वे अपने ‘Quiz Time’ सेगमेंट के लिए बेहद मशहूर थे। उनके आंकड़े सुनकर ऐसा लगता था जैसे कोई प्रोफेसर क्रिकेट का लेक्चर दे रहा हो। अगर वे दिमाग थे, तो…
रवि चतुर्वेदी: हिंदी कमेंट्री के भीष्म पितामह
…रवि चतुर्वेदी क्रिकेट कमेंट्री का दिल थे। उनका उत्साह किसी भी मैच में जान डाल देता था। “गेंद सीमा रेखा की तरफ… और ये चार रन!” उनकी आवाज़ सुनकर श्रोता खुद को स्टेडियम में महसूस करते थे। रवि चतुर्वेदी ने ‘मिड-विकेट’, ‘कवर ड्राइव’ जैसे अंग्रेजी शब्दों को हिंदी के श्रोताओं के लिए आसान बनाया। उन्होंने क्रिकेट की शब्दावली को आम आदमी की ज़ुबान दी।

सुशील दोषी: मालवा की मिठास और जोश
इस लिस्ट में सुशील दोषी का ज़िक्र न हो, ऐसा हो नहीं सकता। “इसी बीच दर्शकों…” उनका तकिया कलाम पूरे देश की जुबान पर था। उनकी कमेंट्री में मालवा की मिठास के साथ गजब का जोश होता था। वे शब्दों को ऐसे दौड़ाते थे कि गेंद से पहले उनकी आवाज़ बाउंड्री पार कर जाती थी।
कमेंटेटर का कहा ही ‘अंतिम सत्य’ था
उस दौर में न DRS था, न थर्ड अंपायर। कमेंटेटर ने जो बोल दिया, वही करोड़ों श्रोताओं के लिए सच होता था। अगर रवि जी ने कह दिया कि “बल्लेबाज साफ पगबाधा आउट है”, तो मान लिया जाता था कि अंपायर की उंगली उठ चुकी है।ट्रांजिस्टर वाला वो दौर भले ही चला गया, पर उन आवाज़ों का जादू आज भी पुराने क्रिकेट प्रेमियों के कानों में गूंजता है।
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