कुंभ में भटकती माँ, बेखबर बेटे: क्या यही समय का तकाज़ा है?
कुंभ में भटकती माँ, बेखबर बेटे: क्या यही समय का तकाज़ा है?
प्रयागराज के कुंभ मेले में 80 वर्षीय रेखा द्विवेदी तीन दिनों से भटक रही थीं। सांस लेने में तकलीफ थी, शरीर कमजोर था, लेकिन सबसे बड़ी तकलीफ शायद अपनों की बेरुखी थी। जब प्रशासन ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया, तो उनके चेहरे पर सिर्फ एक ही सवाल था—“क्या मेरे बेटे मुझे ढूंढने भी नहीं आएंगे?”
रेखा द्विवेदी के चार बेटे हैं—एक इलाहाबाद हाईकोर्ट में सीनियर वकील, दूसरा कॉलेज में लेक्चरर, और बाकी दो भी आर्थिक रूप से संपन्न हैं। लेकिन जब प्रशासन ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की, तो दो के फोन बंद मिले, एक ने कॉल उठाया ही नहीं, और चौथे ने जवाब दिया—“हमें कोई मतलब नहीं… नमस्ते।”
रेखा कहती हैं, “मेरे बेटे नालायक नहीं हैं, वह मजबूर हैं। उन्हें अब पता ही नहीं कि हम कहां हैं, इतना भी प्यार नहीं कि वे हमें ढूंढ निकालें।”
यह सवाल सिर्फ रेखा द्विवेदी का नहीं है, बल्कि हर उस बुजुर्ग का है, जो अपनों की उपेक्षा का शिकार हो रहा है। क्या पैसा, शोहरत और व्यस्त जीवन माता-पिता की ममता से ज्यादा कीमती हो गए हैं? क्या आधुनिक समाज में बुजुर्गों का स्थान केवल यादों में रह गया है?
रेखा अस्पताल में हैं, लेकिन उनकी तकलीफ शारीरिक से ज्यादा भावनात्मक है। प्रशासन उन्हें पूरी मदद दे रहा है, लेकिन क्या उनका दर्द उनके बेटों तक पहुंचेगा? या फिर यह भीड़भाड़ और चमक-धमक के बीच एक और गुमनाम आवाज बनकर रह जाएगा?



